ग़ज़ल--
1212-1122-1212-22
ये बात आज भी साबित है कुछ नज़ीरों से
गये हैं शाह सुकूँ माँगने फ़क़ीरों से
क़दम बढ़ाने से मंज़िल करीब आती है
उलझ रहा है तू क्यों हाथ की लकीरों से
बहुत दिनों से है बरबाद ज़िन्दगी अपनी
लड़ाई कितनी लड़ें अपने हम ज़मीरों से
किया है सामना कुछ यूँ भी तंग दस्ती का
लिबास पहन के निकले सदा अमीरों से
ये किस्से आज भी मौजूद हैं किताबों में
लड़े थे प्यादे कभी किस तरह वज़ीरों से
खिले थे फूल मुहब्बत के जिस जगह अपनी
हवाएं आती हैं रह -रह के उन जज़ीरों से
भटक रहे हो अँधेरों में तुम कहाँ *साग़र*
ये कौन पूछता हम जैसे राहगीरों से