वो आजमाते हैं देके सितम हुनर मेरे जो दिल में रहते हैं कितने हैं बे खबर मेरे बुझा के ताक की सम्मे ना देख तारों को



वो आजमाते हैं  देके  सितम  हुनर  मेरे

जो दिल में रहते हैं कितने हैं बे खबर मेरे


बुझा के ताक की सम्मे ना देख तारों को

इसी  तरह  हुए  बर्बाद  हैं  ये  घर  मेरे


सवाल बनके ना आया करो खयालों में

जहां के बोझ भी देखो हैं कितने सर मेरे


कहां पे छोड़ दिया मुझ को लाके गुरबत ने

के अजनबी सा  लगे मुझ  को हैं  शहर मेरे


कभी जो लिखता था  ताबीर मेरे ख्वाबों की

वो आज पढ़ ना सका फिर क्यों चश्मे तर मेरे


जला ही दे ना  कहीं मेरे  सारे गुलशन को

शबाबे गुल की तपिश दिल में है ये डर मेरे


बुझे चरागों से ये तजरुबा हुआ अब्दुल

के  बनके  आए  अंधेरे  थे  राह  बर मेरे

                               अब्दुल कादिर खान

M Farooq Sumro

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