पद्म श्री अनवर जलालपुरी साहब की छठीं बरसी (पुण्य तिथि) पर खिराज ए अकीदत (श्रद्धांजलि)
Khiraj-e-Aqidat (Tribute) on the sixth death anniversary (death anniversary) of Padma Shri Anwar Jalalpuri Sahab.
जहां यह पलकों पे तुझको सजा के रखता है
आसमाँ तेरी बलन्दी को झुक के तेरी तकता है
तेरा अंदाज़ जुदा, रंग जुदा, फ़िक्र जुदा
तेरे अवसाफ़ कहां अब कोई ला सकता है
(डा.हसन सईद अदबशाला )
इब्तेदाए जहान से लेकर दौरे हाज़िर तक और दौरे हाज़िर से ता क़यामत तक लातादाद इंसान इस क़ुर्रए अर्ज़ पर तशरीफ़ लाए और लाते रहेंगे और बहुत से लोग इसे अलविदा कह कर चले भी गए और आइंदा जाते भी रहेंगे मगर जाने वाले इंसानों को यह ख़ुद गर्ज़ इंसान चन्द लम्हों और कुछ लोगों को चन्द दिनों और कुछ खास लोगों को कुछ महीनों में फरामोश कर देता है लेकिन कुछ अश्ख़ास ऐसे होते हैं जो अपने इल्म ,उख़ूव्वत, भाईचारे, इंसानी हमदर्दी और अपने आला एख़लाक़ से ऐसा कारहाए नुमायां अन्जाम दे जाते हैं कि तवारीख़ के सफहात पर नाबग़ए रोज़गार हो जाते हैं ''''और ऐसी ही शख़्सियत पद्म श्री मोहतरम अनवर जलालपुरी साहब की भी थी।
पद्म श्री अनवर जलालपुरी इल्म व अदब का गहवारा , गंगा जमुनी तहज़ीब का मरकज़, आपसी भाईचारे व हिन्दू- मुस्लिम एकता का संगम क़स्बा जलालपुर जो कि कभी फैज़ाबाद का हिस्सा होता था जहां मीर अनीस, ब्रज नारायण चकबस्त, मुल्ला वजही इत्यादि जैसी अहम शख़्सियतें तशरीफ़ लाईं वही कस्बा अब अंबेडकर नगर का हिस्सा बन चुका है जो चारों तरफ से वलियों, ऋषियों और मुनियों से घिरा है और टवंस नदी के किनारे पर आबाद जहां पर सुबह की अज़ान सुनकर पंडित जी जाग जाते हैं और एक ही हैंडपंप से पंडित जी अपनी लोटिया और मौलाना साहब अपने लोटे में पानी भर कर पूजा व इबादत के लिए ले जाते हैं इसी कस्बे में ६ जूलाई सन 1947 ई. को हाफ़िज़ मोहम्मद हारुन साहब की बग़िया में एक नन्हा-सा फूल खिला और यह फूल जब अपने शबाब पर पहुंचा तो अपनी ख़ूश्बू से सारी कायनात को मोअत्तर कर गया और धीरे-धीरे पूरे गुलशन पर अनवर जलालपुरी के नाम से ग़ालिब हो गया।
क़ुदरत ने मोहतरम को अन्दाज़े तकल्लुम व तख़ातुब ऐसा दिया और ज़बान को इतना शहदीली बनाया कि अगर गुफ़्तुगू करने पर आ जाएं तो फ़िज़ा में एक सुकूत सा तारी हो जाए इंसान तो इंसान चरिंद परिंद भी रक्स करने लगें उनकी आवाज़ में इतना मकनातीसियत थी की ग़मज़दा इंसान को भी क़ल्बी सुकून महसूस होता था।
" अल आमालो बिन्नीयात "
हर इंसान की नियत से अल्ल्लाह ( ईश्वर) वाकिफ है और मोहतरम के दिल में इंसानियत के ख़िदमत की जो बेलौस हमदर्दी और जज़्बा था उसका तज़किरा करने के लिए इस नाचीज़ के पास अल्फ़ाज़ नहीं''''
अनवर जलालपुरी के नज़दीक न कोई काला न गोरा, न अमीर न ग़रीब, क्या बादशाह क्या रियाया,न अहले मसनद न अहले फर्श,क्या ज़मीन क्या आसमां ,क्या काबा क्या कलीसा, न हिंदी न उर्दू, कैसा मज़हब कैसा मसलक सब एक ही ख़ुदा के बन्दे हर एक को शफ़्क़त व मोहब्बत भरी नज़रों से देखते और जो भी हाजतमन्द इनके पास आया हाजतरवा होकर गया कोई रोता हुआ आया तो हंसता हुआ गया हत्ता कि जो भी आया मुत्मइन हो कर गया।
इस बिना पर यह नाचीज़ मोहतरम को सच्चा
" इंसानियत का अलम्बरदार " तसलीम करता है
मोहतरम उर्दू ज़बान व अदब के ऐसे आशिक व शैदाई थे कि जिस का एह़ाता करना बड़ा मुश्किल अम्र मालूम होता है
अंग्रेजी ज़बान के उस्ताद व उस पर पूरा उबूर रखने के बावजूद दुनिया की मशहूर व मकबूल किताबों का उर्दू ज़बान में मन्ज़ूम तर्जुमा कर के सभी उर्दुदां के सरों को फ़ख़्र से बुलन्द कर दिया।
मोहतरम के किन किन असनाफ का ज़िक्र किया जाए उनके अन्दर कुदरत ने गूनागूं सलाहियतें और सिफतें भर दी थीं
मोहतरम आपसी भाईचारे व अम्न व अमान और राष्ट्रीय एकता व अखंडता के ऐसे चिराग़ थे कि जिसकी रौशनी कभी भी कम नहीं हो सकती।
पद्म श्री एक ऐसे दानिश्वर, मुफ़क़्क़िर,अदीब, मुसन्निफ़, मोअर्रिख़,शायर और उम्दा नाज़िम ख़तीब थे कि मौजूदा दौर में दुनिया की तमाम बड़ी शख्सियतों ने उनके ऊपर कुछ न कुछ ज़रूर लिखा जिसे नाचीज़ उनके जुमलों के साथ पेश कर सकता है मगर इस वक्त नहीं वह किसी और मौके पर इंशाअल्लाह पेश किया जाएगा।
हां लेकिन एक शख़्सियत का ज़िक्र न करना मेरे अपने लिए इंसाफ नहीं होगा मोहतरम की रेहलत के बाद जिन्होंने मेरी हर तरीके से रहनुमाई व हर लम्हा मेरी दिलजूई करने वाले इज़्ज़त मआब मोहतरम संतोष कुमार सिंह साहब (पी. सी.एस.) ए. डी.एम. सिटी अयोध्या जिन्होंने जलालपुर के बहुत ही आलीशान प्रोग्राम में कहा था कि
( मैं तहसील जलालपुर में आने से पहले जलालपुर को सिर्फ अनवर जलालपुरी के ही नाम से जानता था )
इसके अलावा आचार्य मुरारी बापू जी ,डाक्टर सै. कल्बे सादिक साहब, सिराज मेहदी साहब, आचार्य प्रमोद कृष्णम जी, मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी, भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद जी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी, उप मुख्यमंत्री डाक्टर दिनेश शर्मा जी, पूर्व मुख्यममंत्री श्री अखिलेश यादव जी, श्री मुलायम सिंह यादव जी, सुश्री बहन मायावती जी, मोहतरम अहमद हसन साहब, मोहतरम आज़म ख़ान साहब, बालीवुड की शख़्सियतें मोहतरम नसीरुद्दीन शाह , राज बब्बर, जावेद अख्तर, माधुरी दीक्षित इत्यादि शख़्सियतों ने अनवर जलालपुरी की शख़्सियत पर कुछ न कुछ लिखा और कहा।
इसके अलावा पूरी दुनिया के लोगों और मीडिया जगत ने भी इनका बखूबी बखान किया टाइम्स आफ इंडिया पत्रिका ने अपने कवर पेज पर इनकी फोटो को शाए किया और लिखा
गूगल ने विकीपीडिया पर इन्हें सम्मान के साथ जगह दी।
मोहतरम से मुतास्सिर होकर हेल्प यू ट्रस्ट प्रधान न्यासी मोहतरम हर्षवर्धन अग्रवाल जी ने अपने सीने से लगाया।
मोहतरम की तालीम पर इतनी नज़र और अपने कस्बे से इतनी मोहब्बत थी कि वह यहां की पसमांदगी और जिहालत को दूर करने के लिए मिर्ज़ा ग़ालिब इंटर कालेज की शक्ल में एक स्कूल तामीर करवाया जो अपनी एक अलग शनाख़्त रखता है
लेकिन हाए अफ़सोस
2 जनवरी सन ,2018 ई. को जब सारी दुनिया नये साल का जश्न मनाने में डूबी हुई थी कि अचानक एक ख़बर ने अनवर जलालपुरी के चाहने वालों को ग़मज़दा कर दिया कि अनवर जलालपुरी अब इस दुनिया में नहीं रहे
इन्ना लिल्लाहे वइन्ना इलैहे राजेऊन
जो जहां था वहीं से इस ख़बर की तस्दीक़ करने लगा शोशल मीडिया प्रिंट मीडिया में तो जैसे तूफान सा उठ गया
मौत उसकी है करे जिसका ज़माना अफसोस
यूं तो आए हैं सभी दुनिया में मरने के लिए
मोहतम का जस्द ख़ाकी लखनऊ से चल कर अपने आबाई वतन जलालपुर में आगया और एक जम्मे ग़फ़ीर की मौजूदगी में 3 जनवरी सन् 2018 ई. को रूहाबाद क़ब्रिस्तान में नम आंखों से सुपुर्दे ख़ाक कर दिया गया।
सुपुर्दे ख़ाक कर देने के बाद लोगों में एक तब्सरै आम था मुस्लिम अपना क़ायद तो हिन्दू अपना पेशवा और ग़रीब व मज़दूर अपना बेहीख़्वां इस नाचीज़ को उस वक्त इंसानी फ़िक्रें
----'''' मुह़य्यरुलउक़ूल'''''--- नज़र आ रही थीं।
हर एक ज़बां पे तेरा तज़किरा अभी तक है
जहां को छोड़ गया तू यक़ीं नहीं होता
यह नाचीज़ और अदबशाला अनवर जलालपुरी दुआ गो है कि अल्लाह ताला मरहूम की मग़फिरत फरमाए और उनके अहले ख़ाना और शैदाइयों को सब्र जमील अता फरमाए आमीन
दुआ का तालिब
डाक्टर हसन सईद
एडमिन एण्ड फाउंडर
अदबशाला "अनवर जलालपुरी "
