जनाज़े पर मेरे लिए देना यारो
मोहब्बत करने वाला जा रहा है
डाक्टर राहत इन्दौरी
''''''''' डाक्टर राहत इन्दौरी साहब की दूसरी पुण्य- तिथि पर अदबशाला अनवर जलालपुरी का ताज़ियती पैग़ाम मरह़ूम व मग़फ़ूर डाक्टर राहत इंदौरी साहब के लवाहिक़ीन और उनके शैदाइयों के नाम '''
है जुदा सबसे ज़माने में तेरा तर्ज़े सुख़न
यह जहाँ तुझको फरामोश नहीं कर सकता
डाक्टर हसन सईद अदबशाला
इस कुर्र-ए अर्ज़ पर हर शब व रोज़ करोड़ों अफ़राद वजूद पाते हैं और लाखों इस दार -ए फ़ानी से कूच भी कर जाते हैं
""'''''''""''' यह फ़ितरत- ए क़ुदरत है "''''"'''"
जो अफ़राद इस दार-ए फ़ानी से दार- ए ब़क़ा की तरफ कूच कर जाते हैं वह गर्दिश-ए अय्याम की नज़्र हो जाते हैं इनमें से कुछ ऐसे ख़ुश्बख़्त अफ़राद भी होते हैं जिनके इस दार-ए फ़ानी से कूच कर जाने के बाद भी याद किया जाता है इनमें भी चन्द लोगों को कुछ माह और कुछ लोगों को चन्द बरसों में उनकी ही तरह उनकी यादों को भी ज़ेरे माज़ी दफ़्न कर दिया जाता है । लेकिन इनमें कुछ अफ़राद ऐसे होते हैं जो अपनी इल्मी सलाहियतों आला किरदार और अता-ए परवरदिगार की बिना पर कायनात पर ग़ालिब हो जाते हैं ऐसी शख़्सियतें तो इस दार-ए फ़ानी से कूच तो कर जाती हैं मगर अपने मुनफ़रिद किरदार , शगुफ्ता गुफ़्तार और उस अते अफ़कार से लोगों के ज़ेहनों और तारीख़ के सफ़ह-ए क़िरतास पर ज़िन्द-ए जावेद बन जाते हैं ऐसी ही शख़्सियत के मालिक मसीहा-ए उर्दू अदब व आबरू-ए ग़ज़ल मोहतरम मरहूम व मग़फ़ूर डाक्टर राहत इंदौरी साहब की भी थी।
ऐसी ही शख़्सियतों को मोअर्रिख़ीन नाबग़-ए रोज़गार के अल्क़ाब से याद करते हैं।
डाक्टर राहत इंदौरी साहब को इस वक़्त मरहूम लिखने में मेरी क़लम नौह़ा कुनाँ तो मेरी आँखें गिरिया कुनाँ हैं।
उर्दू दाँ को किस क़दर उम्मीद थी तुझसे मगर
तू भी रुख़सत हो गया हम सब को तन्हा छोड़ कर
डाक्टर हसन सईद अदबशाला
कौन थे और कहां से आए थे ? डाक्टर राहत
हिन्दुस्तानी तहज़ीब की यकसाँ और जुड़वाँ ज़बानें उर्दू और हिंदी को आपकी मौजूदगी से थी बेपनाह राहत
डाक्टर राहत इंदौरी साहब ने भगवान श्रीकृष्ण जी के फ़लसफ़ा-ए ह़यात से दर्स लेते हुए कि
इन्सान अपनी जिस्मानी रंगत से नहीं बल्कि इन्सान अपने किरदार और इश्क व वफ़ा की मंज़िल तय करता हुआ इस कायनात के आला से आला मुक़ाम पर फ़ायज़ हो सकता है इसी फलसफे को चुना और उसपर अमल करते हुए उर्दू व हिन्दी अदब के आफ़ताब बनकर चमके
डाक्टर राहत इंदौरी साहब की किन किन ख़ूबियो का बख़ान किया जाए वह गूना गूँ शख़्सियत के मालिक थे जिसका अहाता करना गोया
जूए शीर लाने के मुतरादिफ़ है
उनके अन्दर शायराना , दानिश्वराना , फलसफियाना व मुफक्किराना सलाहियतें बदरज-ए अतम मौजूद थी वह एक जहत नहीं बल्कि शश जहात थे ।
वह दौर-ए हाज़िर के उर्दू और हिंदी ज़बान के ऐसे महासागर थे कि जहां
ग़ालिब का अंदाज़-ए बयान , कबीर दास की कबीर पंथी व ईश्वरीय प्रेम, अल्लामा इक़बाल का फ़लसफ़ा-ए हयात और शिकवा व जवाबे शिकवा , जायसी की पदमावत , जोश की इन्क़ेलाबी व जुर्रत मन्दाना हिम्मत , मोमिन की आजिज़ी व इन्केसारी , बेदम की सूफीईज़्म व ख़लवत, इंशाअल्लाह खाँ की दरिया- ए लताफत , मीर हसन की मस्नवी सहर -उल बयानी ,तुलसी दास की रामचरितमानस , मीर तकी मीर का इश्क़ हक़ीक़ी , दर्द की दास्ताने ग़म , उमर खैयाम की रुबाई , मुन्शी प्रेम चन्द की प्रेम पचीसी ,प्रेम बतीसी और समाजी व मआशरती हमदर्दी , सौदा की क़सीदाख़्वानी ,हाली की मद्दो जज़र इस्लाम अनीस व दबीर की मर्सिया ख़्वानी , साहिर की शायरी की सह़र अंगेज़ी , फ़िराक़ व बशीर बद्र की ग़ज़ल सराई ,मीरा बाई की नग़म-ए इश्क़ व वफ़ा , अकबर इलाहाबादी के तख़य्युलात की आज़ादी , तरक़्क़ी पसंद शोरा की हिम्मत अफज़ाई,सर सैयद की तायराना व लौह़-ए मह़फूज़ से आँख मिलाती नज़रे, शिबली का ज़ोहद , डाक्टर मलिक ज़ादा मन्ज़ूर अहमद की शरीफुन्नफसी , पद्म श्री अनवर जलालपुरी की शफ़्क़त भरी शायराना व मुफ़क्क़िराना ख़ुशबू व हमारा अदबी ग्रुप अदबशाला अनवर जलालपुरी की हसरत व यास थे मोहतरम डाक्टर राहत इंदौरी साहब ।
अदबशाला अनवर जलालपुरी को यह कसक ता ज़िन्दगी रहेगी कि मोहतरम अदबशाला के किसी भी अदबी प्रोग्राम में शिरकत किये बिना हम से रुख़सत हो गए हम उनसे वादा वफ़ा नहीं कर सके
मोहतरम को क़ुदरत ने ऐसी ख़ूबियो से नवाज़ा था कि वह जिस किसी भी महफ़िल में शिरकत करते वहां पर अपनी सहर अंगेज़ी से मौजूद लोगों पर वज्द तारी कर देते और इन्सान अपने रन्ज व ग़म को भूल जाता लोगों के वज्द को देख कर उनकी उम्र का इम्तयाज़ करना बड़ा मुश्किल अम्र था
राहत साहब की वतन परस्ती इश्क़ व मोहब्बत भरी जिंदगी , इंसानों से एख़्लाक़ी हमदर्दी , उनके दहने मुबारक से निकली हर बात ख़ुशबू की तरह महकती , इनके दिल में कूट कूट कर भरी थी क़ौमी यकजहती , उर्दू व हिंदी ज़बान को रंजीदा देखकर इनकी आंखों से गंगा-जमुना की धारा अश्क बन कर निकली , ज़बान में थी बड़ी शाइस्तगी व शगुफ़्तगी , लहजा था मानिन्द-ए बादलों के बीच कड़कड़ाती हुई बिजली , आंखों में थी बर्क़ रफ़्तारी , सहीफ़ा आमेज़ पेशानी , सर के बाल थे मिस्ले बनफ़शी , ग़ज़ब की थी फ़िक्र की बालीदगी , क़ौस- ए कज़ा की तरह था शायरी का रंग ,अहले इल्म से वालिहाना दोस्ती , सबसे मुनफ़रिद था अन्दाज़-ए पज़ीराई ऐसे अज़ीमुल मरतबत इन्सान का इस दार-ए फ़ानी से चला जाना गोया ऐसा महसूस होता है कि इनके साथ पूरी कायनात चली गई ।
उर्दू के अदबिस्तान का यह ऐसा आफ़ताब था
जो ग़ुरुब तो हो गया मगर डूबा नहीं
" कुल्लो नफ़सिन ज़ाइक़तुल मौत "
यानी हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है और एक दिन पलट कर सबको उसी की बारगाह में जाना है
मोहतरम ता ज़िन्दगी इन्सानों के एक जम्मे ग़फ़ीर को अपनी मुन्फ़रिद व बेबाक शायरी से लुत्फ अन्दोज़ करते रहे ऐसी मसरुफ़ और भागदौड़ की ज़िन्दगी ने इन्हें कभी इतना मौक़ा फराहम नहीं किया कि कभी तन्हाई में जाकर क़ल्बी सुकून व आराम पा सकें।
परवरदिगार को भी मालूम था कि डाक्टर राहत इंदौरी के रेहलत की ख़बर सुनकर उनके शैदाइयों का हुजूम समन्दर की मानिन्द उमड़ पड़ेगा जनाज़े को काँधा और एक मुट्ठी ख़ाक देने वाले लोग परवाने की तरह टूट पड़ेंगे और उनके इश्क़ में अपने जान की परवाह भी नहीं करेंगे लिहाज़ा मोहतरम की ख़्वाहिश और क़ल्बी सुकून के लिए कोरोना जैसी दहशत भरी बीमारी देकर अपने पास बुलाने का इन्तेज़ाम किया ताकि यह सभी का महबूब बन्दा क़ब्र की आख़िरी मन्ज़िल चन्द अफ़राद की मौजूदगी में तय कर के जन्नतुल फ़िरदौस में दाख़िल हो कर आराम व सुकून के साथ अपनी ज़िन्दगी गुज़ारें और लोगों की गहमागहमी से दूर रहें डाक्टर साहब अपने क़ल्बी सुकून के लिए हम सब को गिरिया कुनाँ और उर्दू अदब को यतीमी का दाग़े फ़ुरक़त देकर चले गए।
इन्ना लिल्लाहे वा इन्ना इलैहे राजेऊन
ख़ैर क़ुदरत का हर फ़ैसला हमें मन्ज़ूर है और मौत हम सब का अपना ह़क़ है ।
मोहतरम आप तो हमें तन्हा छोड़ कर चले गए लेकिन इन्शा अल्लाह उर्दू और हिन्दी अदब जब तक क़ायम व दायम रहेगा आपके नुक़ूश इनके ज़र्रे ज़र्रे में नज़र आएंगे।
उर्दू व हिन्दी अदब के इस तहज़ीबी व शफ़्फ़ाफ़ आईने में अक्स चाहे जितने हों उनमें जो इकलौता मुनव्वर चेहरा नज़र आता है वह चेहरा है डाक्टर राहत इंदौरी साहब का जिसे मिट्टी की दबीज़ चादर भी कभी रुपोश नहीं कर सकती।
हमारे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी और फ़ख़्र की बात है कि डाक्टर राहत इंदौरी साहब जलालपुर में पद्म श्री अनवर जलालपुरी साहब के घर पर रहकर उनके मशविरे के मुताबिक यहीं बाबा बरूआ दास पी जी कालेज से उर्दू में एम ए किया और मेरे बड़े ही मुख़लिस व करमफ़र्मा ब्रादरम अज़ीज़ डाक्टर हरि फ़ैज़ाबादी ने यहीं से डाक्टर राहत इन्दौरी पर पी. एच. डी. मुकम्मल की।
यह तिफ़्ल-ए मकतब और नाचीज़ डाक्टर हसन सईद और अदबशाला अनवर जलालपुरी आप के ग़म में बराबर के शरीक हैं हम आपके अहले ख़ाना बिलख़ुसूस आपकी अहलिया मोहतरमा और आप के फ़रज़न्द मोहतरम सतलज राहत की ख़िदमत में वालिहाना ख़िराजे अक़ीदत पेश करते हैं और दुआ गो भी हैं कि आप का यह अज़ीम ग़म आप के अहले ख़ाना बिलख़ुसूस आपकी अहलिया मोहतरमा और आप के बच्चों को बर्दाश्त करने की क़ूव्वत और आप व पद्म श्री अनवर जलालपुरी की मग़फिरत के साथ साथ जन्नतुल फ़िरदौस के आला तरीन मुक़ाम में एक साथ महशूर फ़रमाए
आमीन या रब्बल आलमीन
रश्ह़ाते क़लम_ डाक्टर हसन सईद जलालपुरी
अध्यक्ष एण्ड फाउंडर
अदबशाला अनवर जलालपुरी एण्ड वेलफेयर फाउंडेशन रजि.
Contact No. 9838838425

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