दोहे--
नारी चिड़िया ही रही ,पुरुष हो गया बाज़।
खुले गगन में कर सके, वह कैसे परवाज़।।
उनको भी दण्डित करो,तब होगा इंसाफ़
बेटों की करतूत जो ,कर देते हैं माफ़ ।।
लड़की तो लाचार है ,सहती है संताप ।
लड़कों की मनमानियाँ ,बढ़ जाती हैं आप ।।
बेटी को कमज़ोर ही ,करते हैं माँ -बाप
सहती है हर ज़ुल्म वह, इसीलिए चुपचाप ।।
हमने ही खींची नहीं ,उनकी कभी लग़ाम ।
इसीलिए साबित हुए ,बेटों पर इल्ज़ाम ।।
सभी समाजों में दिखी,बस इतनी सी बात
कठपुतली की भाँति है,नारी की औकात ।।
🖋विनय साग़र जायसवाल