

खो गयीं वो चिठ्ठियाँ: एक बदलते संसार की दास्तान
M Farooq Sumro
आज के डिजिटल युग में, जब संवाद की गति अद्भुत है, हम अक्सर भूल जाते हैं कि भावनाओं के आदान-प्रदान का एक ऐसा भी ज़माना था, जहाँ हर शब्द, हर वाक्य, हर पंक्ति में भावनाओं का सागर समाया होता था। वो ज़माना था "चिठ्ठियों" का, जो अब केवल यादों की कोठरी में धूल झाड़ रही हैं।
खो गयीं वो नीले रंग के कागज़ पर लिखी चिठ्ठियाँ, जिनमें लिखने का एक ख़ास सलीका होता था। प्रत्येक चिठ्ठी कुशलता की कामना से शुरू होती थी और बड़ों के चरण स्पर्श से समाप्त होती थी। इन चिठ्ठियों के बीच में सिमटी होती थी पूरी जिंदगी। नन्हें बच्चे के आने की खुशखबरी, माँ की तबियत का दर्द, पैसे भेजने का अनुनय, और फसलों के खराब होने का दुख – सब कुछ एक नीले कागज़ में सिमट जाता था।
ये चिठ्ठियाँ केवल कागज़ और स्याही से नहीं, बल्कि भावनाओं से रची-बसी होती थीं। नवयुवना उन्हें सीने से लगाकर अकेले में आँसुओं से तरबतर कर देती थीं। माँ की आस, पिता का संबल, बच्चों का भविष्य, और गाँव का गौरव – ये सब कुछ इन चिठ्ठियों में समाया होता था। डाकिया जब चिठ्ठी लाता था, तो गाँव में एक उत्साह छा जाता था। कोई पढ़कर सुनाता था, और अनपढ़ लोग भी उन चिठ्ठियों को छूकर, उनमें समाई भावनाओं को महसूस करते थे। हर शब्द, हर वाक्य, हर पंक्ति में एक गहरा एहसास छिपा होता था।
पर आज सब बदल गया है। अब स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है, अक्सर ही दिल तोड़ता है। मोबाइल का स्पेस भर जाए, तो सब कुछ दो मिनट में डिलीट हो जाता है। सब कुछ 6 इंच की स्क्रीन में सिमट गया है – जैसे मकान सिमट गए हैं फ्लैटों में, जज़्बात सिमट गए हैं मैसेजों में, चूल्हे सिमट गए हैं गैसों में, और इंसान सिमट गए हैं पैसों में।
यह सिमटना केवल भौतिक नहीं, भावनात्मक भी है। वो गहरे संबंध, वो धैर्य, वो इंतज़ार, वो लम्बे पत्रों में छिपी कहानियाँ – सब कुछ गायब हो गया है। आज के त्वरित संदेशों में भावनाओं की गहराई नहीं होती, वो शब्दों का जादू नहीं होता, जो पुराने ज़माने की चिठ्ठियों में हुआ करता था। एक छोटा सा मैसेज, एक तुरंत जवाब, लेकिन उसमें वो अंतरंगता, वो गहराई, वो इंतज़ार की बेचैनी, वो खुशी का एहसास नहीं होता।
शायद यही वजह है कि वो खो गयीं चिठ्ठियाँ आज हमें इतना याद आती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं एक ऐसे ज़माने की, जहाँ संचार के साथ-साथ भावनाओं का भी आदान-प्रदान होता था, जहाँ हर शब्द दिल से निकलता था और दिल तक पहुँचता था। वो चिठ्ठियाँ न केवल भूतकाल की यादें हैं, बल्कि एक खोते जा रहे मानवीय संबंधों का प्रतीक भी हैं। एक ऐसा प्रतीक जो हमें डिजिटल युग की तेज़ रफ्तार के बीच रुककर सोचने पर मजबूर करता है।
”चिठ्ठियाँ”
“खो गयी वो......”चिठ्ठियाँ” जिसमें “लिखने के सलीके” छुपे होते थे “कुशलता” की कामना से शुरू होते थे
बडों के “चरण स्पर्श” पर खत्म होते थे...!!
“और बीच में लिखी होती थी “जिंदगी”
नन्हें के आने की “खबर”
“माँ” की तबियत का दर्द
और पैसे भेजने का “अनुनय”
“फसलों” के खराब होने की वजह...!!
कितना कुछ सिमट जाता था एक
“नीले से कागज में”...
जिसे नवयौवना भाग कर “सीने” से लगाती
और “अकेले” में आंखो से आंसू बहाती !
“माँ” की आस थी “पिता” का संबल थी
बच्चों का भविष्य थी और
गाँव का गौरव थी ये “चिठ्ठियां”
“डाकिया चिठ्ठी” लायेगा कोई बाँच कर सुनायेगा
देख देख चिठ्ठी को कई कई बार छू कर चिठ्ठी को
अनपढ भी “एहसासों” को पढ़ लेते थे...!!
अब तो “स्क्रीन” पर अंगूठा दौडता हैं
और अक्सर ही दिल तोडता है
“मोबाइल” का स्पेस भर जाए तो
सब कुछ दो मिनट में “डिलीट” होता है...
सब कुछ “सिमट” गया है 6 इंच में
जैसे “मकान” सिमट गए फ्लैटों में
जज्बात सिमट गए “मैसेजों” में
“चूल्हे” सिमट गए गैसों में
और इंसान सिमट गए पैसों में