सर-ए-बाम, हुस्न-वरी, या शम-ए-तूर है
जैसे चराग़-ए-मिनार, की ज़ौ, दूर-दूर है
है चेहरे-ए-अनवरी, पे, माहे-नौ का ख़म
ज़ुल्फ़-ए-दराज़, में, यूँ, अदा-ए-गुरूर है
रंग-ए-रु-ए-आरिज़ -ओ- तहे-चाहे-ज़कन
लब की, सुर्खियों में, तबस्सुम का , नूर है
उफ़ ये मय-ख़्वारियाँ, और साक़ी-ए-चश्म
बे-अदब, बादह-ख़्वार, फ़ज़ा में सुरूर है
साज़-ए-सबा, पे है जुगनू, का रक़्स-ए-रम
आरज़ू-ए-दीद, मह-वश, तवाफ़-ए-तुयूर है
वो मरकज़-ए-निगाह, जाँ-फरोज़-ए-बज़्म
महफ़िल में मलक-सोज़ जमाल-ए-हुज़ूर है
ख़ाक़सार ✍️
माहे नौ = महीने के पहली रात का चाँद
ज़ुल्फ़ ए दराज़ = लम्बे बाल, लम्बी लटें
तहे चाहे ज़कन = डिंपल
बादह ख़्वार = शराब पीने वाला
रक़्स ए रम = रुक रुक कर नाचना
तवाफ़ ए तुयूर = परिंदो का चक्कर लगाना
