ये मेरे अश्क़ गुहर बन के बिखर जाएंगे,
तेरे दामन में पड़ेंगे तो निखर जाएंगे।
तू इन्हें जुल्फ के जिन्दां से रिहा मत करना,
परिंदे पिंजरे से छूटेंगे तो मर जायेंगे।
तू एक बार मेरी बात पे हाँ तो कह दे,
मेरी क़िस्मत के सितारे भी संवर जाएंगे।
निकलना खुल्द से आदम का तो सुना था मगर,
हम तेरी दस्त से निकले तो किधर जाएंगे।
सुना है उसका इरादा मेरे क़तल का है,
हम उसकी राह में हर शामों-सहर जाएंगे।
मेरा सफ़र भी है खानाबदोश के जैसा,
जहां भी रात हो गई, तो ठहर जाएंगे।
उड़ान कितनी ही ऊंची हो परिंदों की मगर,
शाम ढलते ही सभी अपने ही घर जाएंगे।
दिल के ज़ख्मो पे भी पर्दा है जरूरी 'राजन'
कितने ही चेहरों के सब रंग उतर जाएंगे।
'राजन' तिवारी