आज दिखता है कि #शहरों में कितना अँधेरा है हँसती हुई आबादी में इक अपठित सी पीड़ है। आजाद भारत की #बदनसीबी की ये #तस्वीर है।




---------------अपठित सी पीड़---------------



आजाद भारत की #बदनसीबी की ये #तस्वीर है

हर तरफ भटकती हुई #गरीबों की भीड़ है।



#मुफलिसी के #आलम में सब को गाँव जाना है

मगर पैरों में हैं बेड़ियाँ और हाथों में #जंजीर है।



बिलखते बच्चे, #तड़पती मायें, #सिसकते लोग हैं

अमीरी और गरीबी में अब उभरी ये लकीर है।



ओ मसीहा, मेरे मालिक, मेरे रब या मेरे खुदा

झोली भर दे जो इनकी, उसका तरुण फ़कीर है।



जो ऊँची #इमारतों में बड़े #अमीर लोग बसते हैं

उन ही इमारतों के #तेहखनो में रहता #गरीब है।



अब लगता है जरूरत है इक ऐसे #मसीहा की

जो आकर बदले, के इसकी बिगड़ी #तक़दीर है।



आज दिखता है कि #शहरों में कितना अँधेरा है

हँसती हुई आबादी में इक अपठित सी पीड़ है।

आजाद भारत की #बदनसीबी की ये #तस्वीर है।



-तरुण

M Farooq Sumro

I am a vlogger. Making vlogs is my passion.

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